श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.15.10

नवम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तद् विज्ञाय मुनिः प्राह पत्‍नीं कष्टमकारषीः।

घोरो दण्डधरः पुत्रो भ्राता ते ब्रह्मवित्तमः॥ १०

tad vijñāya muniḥ prāha patnīṃ kaṣṭamakāraṣīḥ|

ghoro daṇḍadharaḥ putro bhrātā te brahmavittamaḥ|| 10

अर्थ

जब ऋचीक मुनिको इस बातका पता चला, तब उन्होंने अपनी पत्‍नी सत्यवतीसे कहा कि ‘तुमने बड़ा अनर्थ कर डाला। अब तुम्हारा पुत्र तो लोगोंको दण्ड देनेवाला घोर प्रकृतिका होगा और तुम्हारा भाई होगा एक श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता’॥ १०॥✎ 879

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #879 शब्दोंके बीचका स्थान: कियाथा—फिर → किया था—फिर

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