श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.14.43

नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

स्थालीं न्यस्य वने गत्वा गृहानाध्यायतो निशि।

त्रेतायां संप्रवृत्तायां मनसि त्रय्यवर्तत॥ ४३

sthālīṃ nyasya vane gatvā gṛhānādhyāyato niśi|

tretāyāṃ saṃpravṛttāyāṃ manasi trayyavartata|| 43

अर्थ

जब उन्हें होश हुआ, तब वे स्थालीको वनमें छोड़कर अपने महलमें लौट आये एवं रातके समय उर्वशीका ध्यान करते रहे। इस प्रकार जब त्रेतायुगका प्रारम्भ हुआ, तब उनके हृदयमें तीनों वेद प्रकट हुए॥ ४३॥

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