मा मृथाः पुरुषोऽसि त्वं मा स्म त्वाद्युर्वृका इमे।
क्वापि सख्यं न वै स्त्रीणां वृकाणां हृदयं यथा॥ ३६
mā mṛthāḥ puruṣo'si tvaṃ mā sma tvādyurvṛkā ime|
kvāpi sakhyaṃ na vai strīṇāṃ vṛkāṇāṃ hṛdayaṃ yathā|| 36
अर्थ
उर्वशीने कहा—राजन्! तुम पुरुष हो। इस प्रकार मत मरो। देखो, सचमुच ये भेड़िये तुम्हें खा न जायँ! स्त्रियोंकी किसीके साथ मित्रता नहीं हुआ करती। स्त्रियोंका हृदय और भेड़ियोंका हृदय बिलकुल एक-जैसा होता है॥ ३६॥✎ 20522053
मा मृथाः पुरुषोऽसि त्वं मा स्म त्वाद्युर्वृका इमे।
क्वापि सख्यं न वै स्त्रीणां वृकाणां हृदयं यथा॥ ३६
उर्वशीने कहा—राजन्! तुम पुरुष हो। इस प्रकार मत मरो। देखो, सचमुच ये भेड़िये तुम्हें खा न जायँ! स्त्रियोंकी किसीके साथ मित्रता नहीं हुआ करती। स्त्रियोंका हृदय और भेड़ियोंका हृदय बिलकुल एक-जैसा होता है॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.14.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 73) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/14/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)