श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.14.21

नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

एतावुरणकौ राजन् न्यासौ रक्षस्व मानद।

संरंस्ये भवता साकं श्‍लाघ्यः स्त्रीणां वरः स्मृतः॥ २१

etāvuraṇakau rājan nyāsau rakṣasva mānada|

saṃraṃsye bhavatā sākaṃ ślāghyaḥ strīṇāṃ varaḥ smṛtaḥ|| 21

अर्थ

राजन्! जो पुरुष रूप-गुण आदिके कारण प्रशंसनीय होता है, वही स्त्रियोंको अभीष्ट होता है। अतः मैं आपके साथ अवश्य विहार करूँगी। परन्तु मेरे प्रेमी महाराज! मेरी एक शर्त है। मैं आपको धरोहरके रूपमें भेड़के दो बच्चे सौंपती हूँ। आप इनकी रक्षा करना॥ २१॥

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