श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.11.6

नवम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

अप्रत्तं नस्त्वया किं नु भगवन् भुवनेश्‍वर।

यन्‍नोऽन्तर्हृदयं विश्य तमो हंसि स्वरोचिषा॥ ६

aprattaṃ nastvayā kiṃ nu bhagavan bhuvaneśvara|

yanno'ntarhṛdayaṃ viśya tamo haṃsi svarociṣā|| 6

अर्थ

‘प्रभो! आप सब लोकोंके एकमात्र स्वामी हैं। आप तो हमारे हृदयके भीतर रहकर अपनी ज्योतिसे अज्ञानान्धकारका नाश कर रहे हैं। ऐसी स्थितिमें भला, आपने हमें क्या नहीं दे रखा है॥ ६॥

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