॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.11.34
धूपदीपैः सुरभिभिर्मण्डितं पुष्पमण्डनैः३।
स्त्रीपुम्भिः सुरसंकाशैर्जुष्टं भूषणभूषणैः॥ ३४
dhūpadīpaiḥ surabhibhirmaṇḍitaṃ puṣpamaṇḍanaiḥ|
strīpumbhiḥ surasaṃkāśairjuṣṭaṃ bhūṣaṇabhūṣaṇaiḥ|| 34
अर्थ
रंग-बिरंगी मालाओं, पताकाओं, मणियोंकी चमक, शुद्ध चेतनके समान उज्ज्वल मोती, सुन्दर-सुन्दर भोग-सामग्री, सुगन्धित धूप-दीप तथा फूलोंके गहनोंसे वे महल खूब सजाये हुए थे। आभूषणोंको भी भूषित करनेवाले देवताओंके समान स्त्री-पुरुष उसकी सेवामें लगे रहते थे॥ ३३-३४॥
टिप्पणियाँ
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मण्डलैः।