श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.11.2

नवम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

होत्रेऽददाद्५ दिशं प्राचीं ब्रह्मणे दक्षिणां प्रभुः।

अध्वर्यवे प्रतीचीं च उदीचीं सामगाय सः॥ २

hotre'dadād diśaṃ prācīṃ brahmaṇe dakṣiṇāṃ prabhuḥ|

adhvaryave pratīcīṃ ca udīcīṃ sāmagāya saḥ|| 2

अर्थ

उन्होंने होताको पूर्व दिशा, ब्रह्माको दक्षिण, अध्वर्युको पश्‍चिम और उद्गाताको उत्तर दिशा दे दी॥ २॥

टिप्पणियाँ

  1. ५

    होत्रे तदादिशत्प्राचीं।

    (मुद्रित पृष्ठ 60)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें