श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.11.17

नवम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

स्त्रीपुंप्रसंग एतादृक्सर्वत्र२ त्रासमावहः।

अपीश्‍वराणां किमुत ग्राम्यस्य गृहचेतसः॥ १७

strīpuṃprasaṃga etādṛksarvatra trāsamāvahaḥ|

apīśvarāṇāṃ kimuta grāmyasya gṛhacetasaḥ|| 17

अर्थ

परीक्षित्! यह स्त्री और पुरुषका सम्बन्ध सब कहीं इसी प्रकार दुःखका कारण है। यह बात बड़े-बड़े समर्थ लोगोंके विषयमें भी ऐसी ही है, फिर गृहासक्त विषयी पुरुषके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है॥ १७॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    सर्वत्रोत्तापमावहत्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 62)

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