श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.10.8

नवम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

यः सत्यपाशपरिवीतपितुर्निदेशं

स्त्रैणस्य चापि शिरसा जगृहे सभार्यः।

राज्यं श्रियं प्रणयिनः सुहृदो निवासं

त्यक्त्वा ययौ वनमसूनिव मुक्तसंगः॥ ८

yaḥ satyapāśaparivītapiturnideśaṃ

straiṇasya cāpi śirasā jagṛhe sabhāryaḥ|

rājyaṃ śriyaṃ praṇayinaḥ suhṛdo nivāsaṃ

tyaktvā yayau vanamasūniva muktasaṃgaḥ|| 8

अर्थ

इसके बाद पिताके वचनको सत्य करनेके लिये उन्होंने वनवास स्वीकार किया। यद्यपि महाराज दशरथने अपनी पत्‍नीके अधीन होकर ही उसे वैसा वचन दिया था, फिर भी वे सत्यके बन्धनमें बँध गये थे। इसलिये भगवान्‌ने अपने पिताकी आज्ञा शिरोधार्य की। उन्होंने प्राणोंके समान प्यारे राज्य, लक्ष्मी, प्रेमी, हितैषी, मित्र और महलोंको वैसे ही छोड़कर अपनी पत्‍नीके साथ यात्रा की, जैसे मुक्तसंग योगी प्राणोंको छोड़ देता है॥ ८॥✎ 2048

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2048 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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