उन्होंने प्रभुके सामने उनकी पादुकाएँ रख दीं और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। नेत्रोंसे आँसूकी धारा बहती जा रही थी। भगवान्ने अपने दोनों हाथोंसे पकड़कर बहुत देरतक भरतजीको हृदयसे लगाये रखा। भगवान्के नेत्रजलसे भरतजीका स्नान हो गया॥ ४०॥
पादुके न्यस्य पुरतः प्रांजलिर्बाष्पलोचनः।
तमाश्लिष्य चिरं दोर्भ्यां स्नापयन् नेत्रजैर्जलैः॥ ४०
उन्होंने प्रभुके सामने उनकी पादुकाएँ रख दीं और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। नेत्रोंसे आँसूकी धारा बहती जा रही थी। भगवान्ने अपने दोनों हाथोंसे पकड़कर बहुत देरतक भरतजीको हृदयसे लगाये रखा। भगवान्के नेत्रजलसे भरतजीका स्नान हो गया॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.10.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 58) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/10/40/