श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.10.28

नवम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

कृतैषा विधवा लंका वयं च कुलनन्दन।

देहः कृतोऽन्‍नं गृध्राणामात्मा नरकहेतवे॥ २८

kṛtaiṣā vidhavā laṃkā vayaṃ ca kulanandana|

dehaḥ kṛto'nnaṃ gṛdhrāṇāmātmā narakahetave|| 28

अर्थ

कभी आपके कामोंसे हम सब और समस्त राक्षसवंश आनन्दित होता था और आज हम सब तथा यह सारी लंका नगरी विधवा हो गयी। आपका वह शरीर, जिसके लिये आपने सब कुछ कर डाला, आज गीधोंका आहार बन रहा है और अपने आत्माको आपने नरकका अधिकारी बना डाला। यह सब आपकी ही नासमझी और कामुकताका फल है॥ २८॥

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