मानिनी! वैसे हमलोग एक ही जातिके हैं। फिर भी हम सब एक ही वस्तु चाह रहे हैं, इसलिये हममें डाह और वैरकी गाँठ पड़ गयी है। सुन्दरी! तुम हमारा झगड़ा मिटा दो॥ ६॥✎ 716
सा त्वं नः स्पर्धमानानामेकवस्तुनि मानिनि।
ज्ञातीनां बद्धवैराणां शं विधत्स्व सुमध्यमे॥ ६
मानिनी! वैसे हमलोग एक ही जातिके हैं। फिर भी हम सब एक ही वस्तु चाह रहे हैं, इसलिये हममें डाह और वैरकी गाँठ पड़ गयी है। सुन्दरी! तुम हमारा झगड़ा मिटा दो॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.9.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 948) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/9/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)