श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.9.28

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

एवं सुरासुरगणाः समदेशकाल- ✎ 1841

हेत्वर्थकर्ममतयोऽपि फले विकल्पाः।

तत्रामृतं सुरगणाः फलमञ्जसाऽऽपु-

र्यत्पादपङ्कजरजःश्रयणान्‍न दैत्याः॥ २८

evaṃ surāsuragaṇāḥ samadeśakāla-

hetvarthakarmamatayo'pi phale vikalpāḥ|

tatrāmṛtaṃ suragaṇāḥ phalamañjasā''pu-

ryatpādapaṅkajarajaḥśrayaṇānna daityāḥ|| 28

अर्थ

परीक्षित्! देखो—देवता और दैत्य दोनोंने एक ही समय एक स्थानपर एक प्रयोजन तथा एक वस्तुके लिये एक विचारसे एक ही कर्म किया था, परन्तु फलमें बड़ा भेद हो गया। उनमेंसे देवताओंने बड़ी सुगमतासे अपने परिश्रमका फल—अमृत प्राप्त कर लिया, क्योंकि उन्होंने भगवान्‌के चरणकमलोंकी रजका आश्रय लिया था। परन्तु उससे विमुख होनेके कारण परिश्रम करनेपर भी असुरगण अमृतसे वंचित ही रहे॥ २८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1841 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): समदेशकाल → समदेशकाल-

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