॥ श्रीहरिः ॥
चक्रेण क्षुरधारेण जहार पिबतः शिरः।
हरिस्तस्य कबन्धस्तु सुधयाप्लावितोऽपतत्॥ २५
cakreṇa kṣuradhāreṇa jahāra pibataḥ śiraḥ|
haristasya kabandhastu sudhayāplāvito'patat|| 25
अर्थ
अमृत पिलाते-पिलाते ही भगवान्ने अपने तीखी धारवाले चक्रसे उसका सिर काट डाला। अमृतका संसर्ग न होनेसे उसका धड़ नीचे गिर गया॥ २५॥✎ 721
चक्रेण क्षुरधारेण जहार पिबतः शिरः।
हरिस्तस्य कबन्धस्तु सुधयाप्लावितोऽपतत्॥ २५
अमृत पिलाते-पिलाते ही भगवान्ने अपने तीखी धारवाले चक्रसे उसका सिर काट डाला। अमृतका संसर्ग न होनेसे उसका धड़ नीचे गिर गया॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.9.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 950) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/9/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #721 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्ने