श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.9.25

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

चक्रेण क्षुरधारेण जहार पिबतः शिरः।

हरिस्तस्य कबन्धस्तु सुधयाप्लावितोऽपतत्॥ २५

cakreṇa kṣuradhāreṇa jahāra pibataḥ śiraḥ|

haristasya kabandhastu sudhayāplāvito'patat|| 25

अर्थ

अमृत पिलाते-पिलाते ही भगवान्‌ने अपने तीखी धारवाले चक्रसे उसका सिर काट डाला। अमृतका संसर्ग न होनेसे उसका धड़ नीचे गिर गया॥ २५॥✎ 721

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #721 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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