श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.7.44

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तप्यन्ते लोकतापेन साधवः प्रायशो जनाः।

परमाराधनं तद्धि पुरुषस्याखिलात्मनः॥ ४४

tapyante lokatāpena sādhavaḥ prāyaśo janāḥ|

paramārādhanaṃ taddhi puruṣasyākhilātmanaḥ|| 44

अर्थ

परोपकारी सज्जन प्रायः प्रजाका दुःख टालनेके लिये स्वयं दुःख झेला ही करते हैं। परन्तु यह दुःख नहीं है, यह तो सबके हृदयमें विराजमान भगवान्‌की परम आराधना है॥ ४४॥✎ 706

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #706 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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