ये बेचारे किसी प्रकार अपने प्राणोंकी रक्षा करना चाहते हैं। इस समय मेरा यह कर्तव्य है कि मैं इन्हें निर्भय कर दूँ। जिनके पास शक्ति-सामर्थ्य है, उनके जीवनकी सफलता इसीमें है कि वे दीन-दुःखियोंकी रक्षा करें॥ ३८॥
आसां प्राणपरीप्सूनां विधेयमभयं हि मे।
एतावान्हि प्रभोरर्थो यद् दीनपरिपालनम्॥ ३८
ये बेचारे किसी प्रकार अपने प्राणोंकी रक्षा करना चाहते हैं। इस समय मेरा यह कर्तव्य है कि मैं इन्हें निर्भय कर दूँ। जिनके पास शक्ति-सामर्थ्य है, उनके जीवनकी सफलता इसीमें है कि वे दीन-दुःखियोंकी रक्षा करें॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.7.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 940) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/7/38/