श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.7.35

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

एतत् परं प्र१पश्यामो न परं ते महेश्‍वर।

मृडनाय हि लोकस्य व्यक्तिस्तेऽव्यक्तकर्मणः॥ ३५

etat paraṃ prapaśyāmo na paraṃ te maheśvara|

mṛḍanāya hi lokasya vyaktiste'vyaktakarmaṇaḥ|| 35

अर्थ

हमलोग तो केवल आपके इसी लीलाविहारी रूपको देख रहे हैं। आपके परम स्वरूपको हम नहीं जानते। महेश्‍वर! यद्यपि आपकी लीलाएँ अव्यक्त हैं, फिर भी संसारका कल्याण करनेके लिये आप व्यक्तरूपसे भी रहते हैं॥ ३५॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—प्रार्थयामो।

    (मुद्रित पृष्ठ 940)

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