॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.7.32
कामाध्वरत्रिपुरकालगराद्यनेक-
भूतद्रुहः क्षपयतः स्तुतये न३ तत् ते।
यस्त्वन्तकाल इदमात्मकृतं स्वनेत्र-
वह्निस्फुलिङ्गशिखया भसितं न वेद॥ ३२
kāmādhvaratripurakālagarādyaneka-
bhūtadruhaḥ kṣapayataḥ stutaye na tat te|
yastvantakāla idamātmakṛtaṃ svanetra-
vahnisphuliṅgaśikhayā bhasitaṃ na veda|| 32
अर्थ
आपने कामदेव, दक्षके यज्ञ, त्रिपुरासुर और कालकूट विष (जिसको आप अभी-अभी अवश्य पी जायँगे) और अनेक जीवद्रोही असुरोंको नष्ट कर दिया है। परन्तु यह कहनेसे आपकी कोई स्तुति नहीं होती। क्योंकि प्रलयके समय आपका बनाया हुआ यह विश्व आपके ही नेत्रसे निकली हुई आगकी चिनगारी एवं लपटसे जलकर भस्म हो जाता है और आप इस प्रकार ध्यानमग्न रहते हैं कि आपको इसका पता ही नहीं चलता॥ ३२॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—नमस्ते।