॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.7.2
आरेभिरे सु१संयत्ता अमृतार्थं कुरूद्वह।
हरिः पुरस्ताज्जगृहे पूर्वं देवास्ततोऽभवन्॥ २
ārebhire susaṃyattā amṛtārthaṃ kurūdvaha|
hariḥ purastājjagṛhe pūrvaṃ devāstato'bhavan|| 2
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! देवता और असुरोंने नागराज वासुकिको यह वचन देकर कि समुद्रमन्थनसे प्राप्त होनेवाले अमृतमें तुम्हारा भी हिस्सा रहेगा, उन्हें भी सम्मिलित कर लिया। इसके बाद उन लोगोंने वासुकि नागको नेतीके समान मन्दराचलमें लपेटकर भलीभाँति उद्यत हो बड़े उत्साह और आनन्दसे अमृतके लिये समुद्रमन्थन प्रारम्भ किया। उस समय पहले-पहल अजितभगवान् वासुकिके मुखकी ओर लग गये, इसलिये देवता भी उधर ही आ जुटे॥ १-२॥✎ 695
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—सुरा यत्ता अमृतार्थाः।