॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.7.14
अहीन्द्रसाहस्रकठोरदृङ्मुख-
श्वासाग्निधूमाहतवर्चसोऽसुराः ।
पौलोमकालेयबलील्वलादयो
दावाग्निदग्धाः सरला इवाभवन्॥ १४
ahīndrasāhasrakaṭhoradṛṅmukha-
śvāsāgnidhūmāhatavarcaso'surāḥ |
paulomakāleyabalīlvalādayo
dāvāgnidagdhāḥ saralā ivābhavan|| 14
अर्थ
नागराज वासुकिके हजारों कठोर नेत्र, मुख और श्वासोंसे विषकी आग निकलने लगी। उनके धूएँसे पौलोम, कालेय, बलि, इल्वल आदि असुर निस्तेज हो गये। उस समय वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो दावानलसे झुलसे हुए साखूके पेड़ खड़े हों॥ १४॥