श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.6.7

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

सुदर्शनादिभिः स्वास्त्रैर्मूर्तिमद्भिरुपासिताम्।

तुष्टाव देवप्रवरः सशर्वः पुरुषं परम्।

सर्वामरगणैः साकं सर्वाङ्गैरवनिं गतैः॥ ७

sudarśanādibhiḥ svāstrairmūrtimadbhirupāsitām|

tuṣṭāva devapravaraḥ saśarvaḥ puruṣaṃ param|

sarvāmaragaṇaiḥ sākaṃ sarvāṅgairavaniṃ gataiḥ|| 7

अर्थ

भगवान्‌के निज अस्त्र सुदर्शन चक्र आदि मूर्तिमान् होकर उनकी सेवा कर रहे थे। सभी देवताओंने पृथ्वीपर गिरकर साष्टांग प्रणाम किया फिर सारे देवताओंको साथ ले शंकरजी तथा ब्रह्माजी परम पुरुष भगवान्‌की स्तुति करने लगे॥ ७॥✎ 691

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #691 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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