इसके बाद उन्होंने खेल-ही-खेलमें एक हाथसे उस पर्वतको उठाकर गरुड़पर रख लिया और स्वयं भी सवार हो गये। फिर देवता और असुरोंके साथ उन्होंने समुद्रतटकी यात्रा की॥ ३८॥
गिरिं चारोप्य गरुडे हस्तेनैकेन लीलया।
आरुह्य प्रययावब्धिं सुरासुरगणैर्वृतः॥ ३८
इसके बाद उन्होंने खेल-ही-खेलमें एक हाथसे उस पर्वतको उठाकर गरुड़पर रख लिया और स्वयं भी सवार हो गये। फिर देवता और असुरोंके साथ उन्होंने समुद्रतटकी यात्रा की॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.6.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 934) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/6/38/