श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.6.34

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

दूरभारोद्वहश्रान्ताः शक्रवैरोचनादयः।

अपारयन्तस्तं वोढुं विवशा विजहुः पथि॥ ३४

dūrabhārodvahaśrāntāḥ śakravairocanādayaḥ|

apārayantastaṃ voḍhuṃ vivaśā vijahuḥ pathi|| 34

अर्थ

परन्तु एक तो वह मन्दरपर्वत ही बहुत भारी था और दूसरे उसे ले जाना भी बहुत दूर था। इससे इन्द्र, बलि आदि सब-के-सब हार गये। जब ये किसी प्रकार भी मन्दराचलको आगे न ले जा सके, तब विवश होकर उन्होंने उसे रास्तेमें ही पटक दिया॥ ३४॥✎ 694

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #694 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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