परन्तु एक तो वह मन्दरपर्वत ही बहुत भारी था और दूसरे उसे ले जाना भी बहुत दूर था। इससे इन्द्र, बलि आदि सब-के-सब हार गये। जब ये किसी प्रकार भी मन्दराचलको आगे न ले जा सके, तब विवश होकर उन्होंने उसे रास्तेमें ही पटक दिया॥ ३४॥✎ 694
दूरभारोद्वहश्रान्ताः शक्रवैरोचनादयः।
अपारयन्तस्तं वोढुं विवशा विजहुः पथि॥ ३४
परन्तु एक तो वह मन्दरपर्वत ही बहुत भारी था और दूसरे उसे ले जाना भी बहुत दूर था। इससे इन्द्र, बलि आदि सब-के-सब हार गये। जब ये किसी प्रकार भी मन्दराचलको आगे न ले जा सके, तब विवश होकर उन्होंने उसे रास्तेमें ही पटक दिया॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.6.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 933) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/6/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)