श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.6.14

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

स त्वं विधत्स्वाखिललोकपाला

वयं यदर्थास्तव पादमूलम्।

समागतास्ते बहिरन्तरात्मन्

किं वान्यविज्ञाप्यमशेषसाक्षिणः॥ १४

sa tvaṃ vidhatsvākhilalokapālā

vayaṃ yadarthāstava pādamūlam|

samāgatāste bahirantarātman

kiṃ vānyavijñāpyamaśeṣasākṣiṇaḥ|| 14

अर्थ

आप ही हमारे बाहर और भीतरके आत्मा हैं। हम सब लोकपाल जिस उद्देश्यसे आपके चरणोंकी शरणमें आये हैं, उसे आप कृपा करके पूर्ण कीजिये। आप सबके साक्षी हैं, अतः इस विषयमें हमलोग आपसे और क्या निवेदन करें॥ १४॥

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