॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.5.43
द्रव्यं वयः कर्म गुणान्विशेषं
यद्योगमायाविहितान्वदन्ति ।
यद् दुर्विभाव्यं प्रबुधापबाधं
प्रसीदतां नः स महाविभूतिः॥ ४३
dravyaṃ vayaḥ karma guṇānviśeṣaṃ
yadyogamāyāvihitānvadanti |
yad durvibhāvyaṃ prabudhāpabādhaṃ
prasīdatāṃ naḥ sa mahāvibhūtiḥ|| 43
अर्थ
पंचभूत, काल, कर्म, सत्त्वादि गुण और जो कुछ विवेकी पुरुषोंके द्वारा बाधित किये जानेयोग्य निर्वचनीय या अनिर्वचनीय विशेष पदार्थ हैं, वे सब-के-सब भगवान्की योगमायासे ही बने हैं—ऐसा शास्त्र कहते हैं। वे परम ऐश्वर्यशाली भगवान् हमपर प्रसन्न हों॥ ४३॥✎ 685