श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.40

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

श्रीर्वक्षसः पितरश्छाययाऽऽसन्

धर्मः स्तनादितरः पृष्ठतोऽभूत्।

द्यौर्यस्य शीर्ष्णोऽप्सरसो विहारात्

प्रसीदतां नः स महाविभूतिः॥ ४०

śrīrvakṣasaḥ pitaraśchāyayā''san

dharmaḥ stanāditaraḥ pṛṣṭhato'bhūt|

dyauryasya śīrṣṇo'psaraso vihārāt

prasīdatāṃ naḥ sa mahāvibhūtiḥ|| 40

अर्थ

जिनके वक्षःस्थलसे लक्ष्मी, छायासे पितृगण, स्तनसे धर्म, पीठसे अधर्म, सिरसे आकाश और विहारसे अप्सराएँ प्रकट हुई हैं, वे परम ऐश्‍वर्यशाली भगवान् हमपर प्रसन्‍न हों॥ ४०॥

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