॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.5.36
यच्चक्षुरासीत् तरणिर्देवयानं
त्रयीमयो ब्रह्मण एष धिष्ण्यम्।
द्वारं च मुक्तेरमृतं च मृत्युः
प्रसीदतां नः स महाविभूतिः॥ ३६
yaccakṣurāsīt taraṇirdevayānaṃ
trayīmayo brahmaṇa eṣa dhiṣṇyam|
dvāraṃ ca mukteramṛtaṃ ca mṛtyuḥ
prasīdatāṃ naḥ sa mahāvibhūtiḥ|| 36
अर्थ
जिनके द्वारा जीव देवयानमार्गसे ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है, जो वेदोंकी साक्षात् मूर्ति और भगवान्के ध्यान करनेयोग्य धाम हैं, जो पुण्यलोकस्वरूप होनेके कारण मुक्तिके द्वार एवं अमृतमय हैं और कालरूप होनेके कारण मृत्यु भी हैं—ऐसे सूर्य जिनके नेत्र हैं, वे परम ऐश्वर्यशाली भगवान् हमपर प्रसन्न हों॥ ३६॥