॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.5.27
विपश्चितं प्राणमनोधियात्मना-
मर्थेन्द्रियाभासमनिद्रमव्रणम् ।
छायातपौ यत्र न गृध्रपक्षौ
तमक्षरं खं त्रियुगं व्रजामहे१॥ २७
vipaścitaṃ prāṇamanodhiyātmanā-
marthendriyābhāsamanidramavraṇam |
chāyātapau yatra na gṛdhrapakṣau
tamakṣaraṃ khaṃ triyugaṃ vrajāmahe|| 27
अर्थ
आप प्राण, मन, बुद्धि और अहंकारके ज्ञाता हैं। इन्द्रियाँ और उनके विषय दोनों ही आपके द्वारा प्रकाशित होते हैं। अज्ञान आपका स्पर्श नहीं कर सकता। प्रकृतिके विकार मरने-जीनेवाले शरीरसे भी आप रहित हैं। जीवके दोनों पक्ष—अविद्या और विद्या आपमें बिलकुल ही नहीं हैं। आप अविनाशी और सुखस्वरूप हैं। सत्ययुग, त्रेता और द्वापरमें तो आप प्रकटरूपसे ही विराजमान रहते हैं। हम सब आपकी शरण ग्रहण करते हैं॥ २७॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—नमामहे।