श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.17

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

निशाम्यैतत् सुरगणा महेन्द्रवरुणादयः।

नाध्यगच्छन्स्वयं मन्त्रैर्मन्त्रयन्तो विनिश्‍चयम्॥ १७

niśāmyaitat suragaṇā mahendravaruṇādayaḥ|

nādhyagacchansvayaṃ mantrairmantrayanto viniścayam|| 17

अर्थ

यह सब दुर्दशा देखकर इन्द्र, वरुण आदि देवताओंने आपसमें बहुत कुछ सोचा-विचारा; परन्तु अपने विचारोंसे वे किसी निश्‍चयपर नहीं पहुँच सके॥ १७॥

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