श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.12

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे।

निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च॥ १२

namaḥ śāntāya ghorāya mūḍhāya guṇadharmiṇe|

nirviśeṣāya sāmyāya namo jñānaghanāya ca|| 12

अर्थ

जो सत्त्व, रज, तम—इन तीन गुणोंका धर्म स्वीकार करके क्रमशः शान्त, घोर और मूढ़ अवस्था भी धारण करते हैं, उन भेदरहित समभावसे स्थित एवं ज्ञानघन प्रभुको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ॥ १२॥

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