श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.24.6

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

उच्चावचेषु भूतेषु चरन् वायुरिवेश्‍वरः।

नोच्चावचत्वं भजते निर्गुणत्वाद्धियो गुणैः॥ ६

uccāvaceṣu bhūteṣu caran vāyuriveśvaraḥ|

noccāvacatvaṃ bhajate nirguṇatvāddhiyo guṇaiḥ|| 6

अर्थ

वे सर्वशक्तिमान् प्रभु वायुकी तरह नीचे-ऊँचे, छोटे-बड़े सभी प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे लीला करते रहते हैं। परन्तु उन-उन प्राणियोंके बुद्धिगत गुणोंसे वे छोटे-बड़े या ऊँचे-नीचे नहीं हो जाते। क्योंकि वे वास्तवमें समस्त प्राकृत गुणोंसे रहित—निर्गुण हैं॥ ६॥

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