श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.24.46

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

राजोवाच

अनाद्यविद्योपहतात्मसंविद-

स्तन्मूलसंसारपरिश्रमातुराः ।

यदृच्छयेहोपसृता यमाप्नुयु-

र्विमुक्तिदो नः परमो गुरुर्भवान्॥ ४६

anādyavidyopahatātmasaṃvida-

stanmūlasaṃsārapariśramāturāḥ |

yadṛcchayehopasṛtā yamāpnuyu-

rvimuktido naḥ paramo gururbhavān|| 46

अर्थ

राजा सत्यव्रतने कहा—प्रभो! संसारके जीवोंका आत्मज्ञान अनादि अविद्यासे ढक गया है। इसी कारण वे संसारके अनेकानेक क्लेशोंके भारसे पीड़ित हो रहे हैं। जब अनायास ही आपके अनुग्रहसे वे आपकी शरणमें पहुँच जाते हैं तब आपको प्राप्त कर लेते हैं। इसलिये हमें बन्धनसे छुड़ाकर वास्तविक मुक्ति देनेवाले परम गुरु आप ही हैं॥ ४६॥✎ 2039

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2039 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें