श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.24.44

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

सोऽनुध्यातस्ततो राज्ञा प्रादुरासीन्महार्णवे।

एकशृङ्गधरो मत्स्यो हैमो नियुतयोजनः॥ ४४

so'nudhyātastato rājñā prādurāsīnmahārṇave|

ekaśṛṅgadharo matsyo haimo niyutayojanaḥ|| 44

अर्थ

उनकी आज्ञासे राजाने भगवान्‌का ध्यान किया। उसी समय उस महान् समुद्रमें मत्स्यके रूपमें भगवान् प्रकट हुए। मत्स्यभगवान्‌का शरीर सोनेके समान देदीप्यमान था और शरीरका विस्तार था चार लाख कोस। उनके शरीरमें एक बड़ा भारी सींग भी था॥ ४४॥✎ 839 840 841

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #839 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #840 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #841 शब्दोंके बीचका स्थान: ध्यानकिया। → ध्यान किया।

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