मत्स्यभगवान्की यह मधुर वाणी सुनकर राजा सत्यव्रत मोहमुग्ध हो गये। उन्होंने कहा—‘मत्स्यका रूप धारण करके मुझे मोहित करनेवाले आप कौन हैं?॥ २५॥✎ 834
एवं विमोहितस्तेन वदता वल्गुभारतीम्।
तमाह को भवानस्मान् मत्स्यरूपेण मोहयन्॥ २५
मत्स्यभगवान्की यह मधुर वाणी सुनकर राजा सत्यव्रत मोहमुग्ध हो गये। उन्होंने कहा—‘मत्स्यका रूप धारण करके मुझे मोहित करनेवाले आप कौन हैं?॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.24.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1017) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/24/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#834 शब्दोंके बीचका स्थान: मत्स्यभगवान् की → मत्स्यभगवान्की