फिर उसने राजा सत्यव्रतसे कहा—‘राजन्! अब यह मटका भी मेरे लिये पर्याप्त नहीं है। इसमें मैं सुखपूर्वक नहीं रह सकती। मैं तुम्हारी शरणमें हूँ, इसलिये मेरे रहनेयोग्य कोई बड़ा-सा स्थान मुझे दो’॥ २०॥✎ 8332038
न म एतदलं राजन् सुखं वस्तुमुदञ्चनम्।
पृथु देहि पदं मह्यं यत् त्वाहं शरणं गता॥ २०
फिर उसने राजा सत्यव्रतसे कहा—‘राजन्! अब यह मटका भी मेरे लिये पर्याप्त नहीं है। इसमें मैं सुखपूर्वक नहीं रह सकती। मैं तुम्हारी शरणमें हूँ, इसलिये मेरे रहनेयोग्य कोई बड़ा-सा स्थान मुझे दो’॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.24.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1016) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/24/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#833 शब्दोंके बीचका स्थान: मत्स्यभगवान् ने → मत्स्यभगवान्ने