इन्द्रको एक तो त्रिभुवनका राज्य मिल गया और दूसरे, वामनभगवान्के करकमलोंकी छत्रछाया! सर्वश्रेष्ठ ऐश्वर्यलक्ष्मी उनकी सेवा करने लगी और वे निर्भय होकर आनन्दोत्सव मनाने लगे॥ २५॥✎ 8248258261629
प्राप्य त्रिभुवनं चेन्द्र उपेन्द्रभुजपालितः।
श्रिया परमया जुष्टो मुमुदे गतसाध्वसः॥ २५
इन्द्रको एक तो त्रिभुवनका राज्य मिल गया और दूसरे, वामनभगवान्के करकमलोंकी छत्रछाया! सर्वश्रेष्ठ ऐश्वर्यलक्ष्मी उनकी सेवा करने लगी और वे निर्भय होकर आनन्दोत्सव मनाने लगे॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.23.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1013) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/23/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)