श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.23.1

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

बलिका बन्धनसे छूटकर सुतललोकको जाना

श्रीशुक उवाच

इत्युक्तवन्तं पुरुषं पुरातनं

महानुभावोऽखिलसाधुसंमतः ।

बद्धाञ्जलिर्बाष्पकलाकुलेक्षणो

भक्त्युद्गलो गद्गदया गिराब्रवीत्॥ १

ityuktavantaṃ puruṣaṃ purātanaṃ

mahānubhāvo'khilasādhusaṃmataḥ |

baddhāñjalirbāṣpakalākulekṣaṇo

bhaktyudgalo gadgadayā girābravīt|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—जब सनातन पुरुष भगवान्‌ने इस प्रकार कहा, तो साधुओंके आदरणीय महानुभाव दैत्यराजके नेत्रोंमें आँसू छलक आये। प्रेमके उद्रेकसे उनका गला भर आया। वे हाथ जोड़कर गद्गद वाणीसे भगवान्‌से कहने लगे॥ १॥✎ 817 818

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #817 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #818 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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