श्रीशुकदेवजी कहते हैं—जब सनातन पुरुष भगवान्ने इस प्रकार कहा, तो साधुओंके आदरणीय महानुभाव दैत्यराजके नेत्रोंमें आँसू छलक आये। प्रेमके उद्रेकसे उनका गला भर आया। वे हाथ जोड़कर गद्गद वाणीसे भगवान्से कहने लगे॥ १॥✎ 817818
इत्युक्तवन्तं पुरुषं पुरातनं
महानुभावोऽखिलसाधुसंमतः ।
बद्धाञ्जलिर्बाष्पकलाकुलेक्षणो
भक्त्युद्गलो गद्गदया गिराब्रवीत्॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—जब सनातन पुरुष भगवान्ने इस प्रकार कहा, तो साधुओंके आदरणीय महानुभाव दैत्यराजके नेत्रोंमें आँसू छलक आये। प्रेमके उद्रेकसे उनका गला भर आया। वे हाथ जोड़कर गद्गद वाणीसे भगवान्से कहने लगे॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.23.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1011) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/23/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)