श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.22.30

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

गुरुणा भर्त्सितः शप्तो जहौ सत्यं न सुव्रतः।

छलैरुक्तो मया धर्मो नायं त्यजति सत्यवाक्॥ ३०

guruṇā bhartsitaḥ śapto jahau satyaṃ na suvrataḥ|

chalairukto mayā dharmo nāyaṃ tyajati satyavāk|| 30

अर्थ

इसका धन छीन लिया, राजपदसे अलग कर दिया, तरह-तरहके आक्षेप किये, शत्रुओंने बाँध लिया, भाई-बन्धु छोड़कर चले गये, इतनी यातनाएँ भोगनी पड़ीं—यहाँतक कि गुरुदेवने भी इसको डाँटा-फटकारा और शापतक दे दिया। परन्तु इस दृढव्रतीने अपनी प्रतिज्ञा नहीं छोड़ी। मैंने इससे छलभरी बातें कीं, मनमें छल रखकर धर्मका उपदेश किया; परन्तु इस सत्यवादीने अपना धर्म न छोड़ा॥ २९-३०॥

यह अर्थ श्लोक 29–30 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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