श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.22.27

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

मानस्तम्भनिमित्तानां जन्मादीनां समन्ततः।

सर्वश्रेयः प्रतीपानां हन्त मुह्येन्‍न मत्परः॥ २७

mānastambhanimittānāṃ janmādīnāṃ samantataḥ|

sarvaśreyaḥ pratīpānāṃ hanta muhyenna matparaḥ|| 27

अर्थ

कुलीनता आदि बहुत-से ऐसे कारण हैं, जो अभिमान और जडता आदि उत्पन्‍न करके मनुष्यको कल्याणके समस्त साधनोंसे वंचित कर देते हैं; परन्तु जो मेरे शरणागत होते हैं, वे इनसे मोहित नहीं होते॥ २७॥✎ 816

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #816 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें