श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.21.5

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

ब्रह्मादयो लोकनाथाः स्वनाथाय समादृताः।

सानुगा बलिमाजह्रुः संक्षिप्तात्मविभूतये॥ ५

brahmādayo lokanāthāḥ svanāthāya samādṛtāḥ|

sānugā balimājahruḥ saṃkṣiptātmavibhūtaye|| 5

अर्थ

जब भगवान्‌ने अपने स्वरूपको कुछ छोटा कर लिया, अपनी विभूतियोंको कुछ समेट लिया, तब ब्रह्मा आदि लोकपालोंने अपने अनुचरोंके साथ बड़े आदरभावसे अपने स्वामी भगवान्‌को अनेकों प्रकारकी भेंटें समर्पित कीं॥ ५॥✎ 804 805 806 807 808

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #804 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #805 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #806 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #807 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #808 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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