श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.21.33

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

वृथा मनोरथस्तस्य दूरे स्वर्गः पतत्यधः।

प्रतिश्रुतस्यादानेन योऽर्थिनं विप्रलम्भते॥ ३३

vṛthā manorathastasya dūre svargaḥ patatyadhaḥ|

pratiśrutasyādānena yo'rthinaṃ vipralambhate|| 33

अर्थ

जब सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने बलिको इस प्रकार बँधवा दिया, तब पृथ्वी, आकाश और समस्त दिशाओंमें लोग ‘हाय-हाय!’ करने लगे॥ २७॥ यद्यपि बलि वरुणके पाशोंसे बँधे हुए थे, उनकी सम्पत्ति भी उनके हाथोंसे निकल गयी थी—फिर भी उनकी बुद्धि निश्‍चयात्मक थी और सब लोग उनके उदार यशका गान कर रहे थे। परीक्षित्! उस समय भगवान्‌ने बलिसे कहा॥ २८॥ ‘असुर! तुमने मुझे पृथ्वीके तीन पग दिये थे; दो पगमें तो मैंने सारी त्रिलोकी नाप ली, अब तीसरा पग पूरा करो॥ २९॥ जहाँतक सूर्यकी गरमी पहुँचती है, जहाँतक नक्षत्रों और चन्द्रमाकी किरणें पहुँचती हैं और जहाँतक बादल जाकर बरसते हैं—वहाँतककी सारी पृथ्वी तुम्हारे अधिकारमें थी॥ ३०॥ तुम्हारे देखते-ही-देखते मैंने अपने एक पैरसे भूर्लोक, शरीरसे आकाश और दिशाएँ एवं दूसरे पैरसे स्वर्लोक नाप लिया है। इस प्रकार तुम्हारा सब कुछ मेरा हो चुका है॥ ३१॥ फिर भी तुमने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे पूरा न कर सकनेके कारण अब तुम्हें नरकमें रहना पड़ेगा। तुम्हारे गुरुकी तो इस विषयमें सम्मति है ही; अब जाओ, तुम नरकमें प्रवेश करो॥ ३२॥ जो याचकको देनेकी प्रतिज्ञा करके मुकर जाता है और इस प्रकार उसे धोखा देता है, उसके सारे मनोरथ व्यर्थ होते हैं। स्वर्गकी बात तो दूर रही, उसे नरकमें गिरना पड़ता है॥ ३३॥ ✎ 810

यह व्याख्या श्लोक 8.21.27 से 8.21.33 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #810 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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