श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.21.3

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

अथाङ्घ्रये प्रोन्‍नमिताय विष्णो-

रुपाहरत् पद्मभवोऽर्हणोदकम्।

समर्च्य भक्‍त्याभ्यगृणाच्छुचिश्रवा

यन्‍नाभिपङ्केरुहसंभवः स्वयम्॥ ३

athāṅghraye pronnamitāya viṣṇo-

rupāharat padmabhavo'rhaṇodakam|

samarcya bhaktyābhyagṛṇācchuciśravā

yannābhipaṅkeruhasaṃbhavaḥ svayam|| 3

अर्थ

भगवान् ब्रह्माकी कीर्ति बड़ी पवित्र है। वे विष्णुभगवान्‌के नाभिकमलसे उत्पन्‍न हुए हैं। अगवानी करनेके बाद उन्होंने स्वयं विश्‍वरूपभगवान्‌के ऊपर उठे हुए चरणका अर्घ्यपाद्यसे पूजन किया, प्रक्षालन किया। पूजा करके बड़े प्रेम और भक्तिसे उन्होंने भगवान्‌की स्तुति की॥ ३॥✎ 802

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #802 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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