श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.21.11

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

अनेन याचमानेन शत्रुणा वटुरूपिणा।

सर्वस्वं नो हृतं भर्तुर्न्यस्तदण्डस्य बर्हिषि॥ ११

anena yācamānena śatruṇā vaṭurūpiṇā|

sarvasvaṃ no hṛtaṃ bharturnyastadaṇḍasya barhiṣi|| 11

अर्थ

जब हमारे स्वामी यज्ञमें दीक्षित होकर किसीको किसी प्रकारका दण्ड देनेके लिये उपरत हो गये हैं, तब इस शत्रुने ब्रह्मचारीका वेष बनाकर पहले तो याचना की और पीछे हमारा सर्वस्व हरण कर लिया॥ ११॥

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