दधीचि, शिबि आदि महापुरुषोंने अपने परम प्रिय दुस्त्यज प्राणोंका दान करके भी प्राणियोंकी भलाई की है। फिर पृथ्वी आदि वस्तुओंको देनेमें सोच-विचार करनेकी क्या आवश्यकता है?॥ ७॥
श्रेयः कुर्वन्ति भूतानां साधवो दुस्त्यजासुभिः।
दध्यङ् शिबिप्रभृतयः को विकल्पो धरादिषु॥ ७
दधीचि, शिबि आदि महापुरुषोंने अपने परम प्रिय दुस्त्यज प्राणोंका दान करके भी प्राणियोंकी भलाई की है। फिर पृथ्वी आदि वस्तुओंको देनेमें सोच-विचार करनेकी क्या आवश्यकता है?॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.20.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 998) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/20/7/