श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.20.4

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

न ह्यसत्यात् परोऽधर्म इति होवाच भूरियम्।

सर्वं सोढुमलं मन्ये ऋतेऽलीकपरं नरम्॥ ४

na hyasatyāt paro'dharma iti hovāca bhūriyam|

sarvaṃ soḍhumalaṃ manye ṛte'līkaparaṃ naram|| 4

अर्थ

इस पृथ्वीने कहा है कि ‘असत्यसे बढ़कर कोई अधर्म नहीं है। मैं सब कुछ सहनेमें समर्थ हूँ, परन्तु झूठे मनुष्यका भार मुझसे नहीं सहा जाता’॥ ४॥

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