श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.20.33

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

मधुव्रतस्रग्वनमालया वृतो

रराज राजन्भगवानुरुक्रमः।

क्षितिं पदैकेन बलेर्विचक्रमे

नभः शरीरेण दिशश्‍च बाहुभिः॥ ३३

madhuvratasragvanamālayā vṛto

rarāja rājanbhagavānurukramaḥ|

kṣitiṃ padaikena balervicakrame

nabhaḥ śarīreṇa diśaśca bāhubhiḥ|| 33

अर्थ

वे पाँच प्रकारके पुष्पोंकी बनी वनमाला धारण किये हुए थे, जिसपर मधुलोभी भौंरे गुंजार कर रहे थे। उन्होंने अपने एक पगसे बलिकी सारी पृथ्वी नाप ली, शरीरसे आकाश और भुजाओंसे दिशाएँ घेर लीं; दूसरे पगसे उन्होंने स्वर्गको भी नाप लिया। तीसरा पैर रखनेके लिये बलिकी तनिक-सी भी कोई वस्तु न बची। भगवान्‌का वह दूसरा पग ही ऊपरकी ओर जाता हुआ महर्लोक, जनलोक और तपलोकसे भी ऊपर सत्यलोकमें पहुँच गया॥ ३३-३४॥

यह अर्थ श्लोक 33–34 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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