tathāpyenaṃ na hiṃsiṣye bhītaṃ brahmatanuṃ ripum|| 12
अर्थ
यदि मेरे अपराध न करनेपर भी ये अधर्मसे मुझे बाँध लेंगे, तब भी मैं इनका अनिष्ट नहीं चाहूँगा। क्योंकि मेरे शत्रु होनेपर भी इन्होंने भयभीत होकर ब्राह्मणका शरीर धारण किया है॥ १२॥
यदप्यसावधर्मेण मां बध्नीयादनागसम्।
तथाप्येनं न हिंसिष्ये भीतं ब्रह्मतनुं रिपुम्॥ १२
यदि मेरे अपराध न करनेपर भी ये अधर्मसे मुझे बाँध लेंगे, तब भी मैं इनका अनिष्ट नहीं चाहूँगा। क्योंकि मेरे शत्रु होनेपर भी इन्होंने भयभीत होकर ब्राह्मणका शरीर धारण किया है॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.20.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 999) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/20/12/