॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.2.28
तथाऽऽतुरं यूथपतिं करेणवो
विकृष्यमाणं तरसा बलीयसा।
विचुक्रुशुर्दीनधियोऽपरे गजाः
पार्ष्णिग्रहास्तारयितुं न चाशकन्॥ २८
tathā''turaṃ yūthapatiṃ kareṇavo
vikṛṣyamāṇaṃ tarasā balīyasā|
vicukruśurdīnadhiyo'pare gajāḥ
pārṣṇigrahāstārayituṃ na cāśakan|| 28
अर्थ
दूसरे हाथी, हथिनियों और उनके बच्चोंने देखा कि उनके स्वामीको बलवान् ग्राह बड़े वेगसे खींच रहा है और वे बहुत घबरा रहे हैं। उन्हें बड़ा दुःख हुआ। वे बड़ी विकलतासे चिग्घाड़ने लगे। बहुतोंने उसे सहायता पहुँचाकर जलसे बाहर निकाल लेना चाहा, परन्तु इसमें भी वे असमर्थ ही रहे॥ २८॥