श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.2.24

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

सरोऽनिलं पङ्कजरेणुरूषितं

जिघ्रन्विदूरान्मदविह्वलेक्षणः ।

वृतः स्वयूथेन तृषार्दितेन तत्

सरोवराभ्याशमथागमद् द्रुतम्॥ २४

saro'nilaṃ paṅkajareṇurūṣitaṃ

jighranvidūrānmadavihvalekṣaṇaḥ |

vṛtaḥ svayūthena tṛṣārditena tat

sarovarābhyāśamathāgamad drutam|| 24

अर्थ

उसके पीछे-पीछे हाथियोंके छोटे-छोटे बच्चे दौड़ रहे थे। बड़े-बड़े हाथी और हथिनियाँ भी उसे घेरे हुए चल रही थीं। उसकी धमकसे पहाड़ एकबारगी काँप उठता था। उसके गण्डस्थलसे टपकते हुए मदका पान करनेके लिये साथ-साथ भौंरे उड़ते जा रहे थे। मदके कारण उसके नेत्र विह्वल हो रहे थे। बड़े जोरकी धूप थी, इसलिये वह व्याकुल हो गया और उसे तथा उसके साथियोंको प्यास भी सताने लगी। उस समय दूरसे ही कमलके परागसे सुवासित वायुकी गन्ध सूँघकर वह उसी सरोवरकी ओर चल पड़ा, जिसकी शीतलता और सुगन्ध लेकर वायु आ रही थी। थोड़ी ही देरमें वेगसे चलकर वह सरोवरके तटपर जा पहुँचा॥ २३-२४॥✎ 2027 2028

यह अर्थ श्लोक 23–24 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #2027 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2028 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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