॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.19.42
अथैतत् पूर्णमभ्यात्मं यच्च नेत्यनृतं वचः।
सर्वं नेत्यनृतं ब्रूयात् स दुष्कीर्तिः श्वसन्मृतः॥ ४२
athaitat pūrṇamabhyātmaṃ yacca netyanṛtaṃ vacaḥ|
sarvaṃ netyanṛtaṃ brūyāt sa duṣkīrtiḥ śvasanmṛtaḥ|| 42
अर्थ
इसके विपरीत ‘मैं नहीं दूँगा’—यह जो अस्वीकारात्मक असत्य है, वह अपने धनको सुरक्षित रखने तथा पूर्ण करनेवाला है। परन्तु ऐसा सब समय नहीं करना चाहिये। जो सबसे, सभी वस्तुओंके लिये नहीं करता रहता है, उसकी अपकीर्ति हो जाती है। वह तो जीवित रहनेपर भी मृतकके समान ही है॥ ४२॥